मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

आरज़ू लखनवी

                                            कविता/कलाम



          भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो 
        जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो
        रस्में इस अंधेर नगरी की नई नहीं यह पुरानी हैं
        मह्र पे डालो रात का पर्दा माह को रौशन रहने दो
        रूह निकल कर बाग़-ए-जहां से बाग़-ए-जनाॅ में जा पहुंचे 
        चेहरे पे अपने मेरी निगाहें इतनी देर तो रहने दो
        ख़न्दा-ए-गुल बुलबुल में होगा, गुल में नग़मा बुलबुल का 
        क़िस्सा एक, ज़ुबानें दो हैं आप कहो या कहने दो
        अपना जुनूंन-ए-शौक दिया क्यों ख़ौफ जो था रूस्वाई का
        बात करो खुद काबिल-ए-शिकवा उल्टे मुझ को उल्हने दो .

  • नामः सिराजुद्दीन अली खां 
  • पैदाइश 1689, वफात 1756
  • मायने -महर्ः सूरज, माह: चांद, जनाॅः स्वर्ग

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